‘तैमूर ने सैफ अली खान को पहली बार अब्बा कहा’ – ऐसे देती है मीडिया बॉलीवुड में वंशवाद को बढ़ावा

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फ़िल्मकार अभिषेक कपूर ने हाल ही में एक चौंकाने वाला खुलासा किया। उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत की मानसिक अवस्था के बारे में बात करते हुए बताया, “फिल्म शूटिंग के दौरान सुशांत, सारा अली खान को मिल रही पब्लिसिटी से कुछ अपसेट नजर आ रहे थे। मैं मानता हूँ कि फिल्म की तैयारी के दौरान मैंने सुशांत के साथ उतना वक्त नहीं बिता पाया, जितना मैंने सारा के साथ बिताया”।

अभिषेक कपूर ने आगे बताया, “मुझे याद है जब केदारनाथ रिलीज हुई, मीडिया उन पर निशाना साध रही थी। मुझे नहीं पता क्या हुआ था। सुशांत सिंह देख रहे थे फिल्म के लिए मीडिया में सारा अली खान को ज्यादा हाईप मिल रहा था, जिसकी वजह से उनकी पब्लिसिटी कम हो गई थी। सारा को मिल रही तारीफ से सुशांत कुछ नाराज रहने लगे थे”।

इस बयान के साथ ही अभिषेक कपूर ने बॉलीवुड में वंशवाद को बढ़ावा देने के एक प्रमुख कारण पर उंगली उठाई , और वो है भारतीय मीडिया। अभिषेक कपूर ने जो बताया, वो तो मात्र एक उदाहरण है, यदि वंशवाद को बॉलीवुड में वास्तव में किसी ने महत्व दिया है, और इसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया है, तो वो भारतीय मीडिया है।

फादर्स डे पर तैमूर ने जताया प्यार!”

“तैमूर की इन पिक्स को देखकर आप भी कहेंगे awwww!”

“अनन्या पाण्डे की लेटेस्ट फोटो शूट को देखिये!”

“सुहाना खान ने बताई अपने स्ट्रगल की दास्तान!”

यह मात्र कुछ उदाहरण है, जो ये सिद्ध करता है कि किस तरह से भारतीय मीडिया स्वयं वंशवाद को बढ़ावा देती है। बॉलीवुड के लिए मीडिया ने एक विशेष विभाग स्थापित कर रखा है, जिसपर बॉलीवुड सेलेब्स की गतिविधियों पर आवश्यक से ज़्यादा ध्यान दिया जाता है। यही मीडिया आजकल सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु के बाद से सलमान खान, करण जौहर और स्टार किड्स के पीछे हाथ धोकर पड़ी है, परंतु यही मीडिया वास्तव में इन स्टार किड्स को ही अधिक प्राथमिकता देती है।

उदाहरण के लिए यदि रणदीप हुड्डा और अर्जुन कपूर की फिल्में एक साथ रिलीज़ होनी हो, तो मीडिया पहले प्राथमिकता अर्जुन कपूर की फिल्मों को ही देगी। रणदीप हुड्डा चाहे अपने रोल के लिए कितना ही कायाकल्प क्यों न कर ले, उन्हे वैसी कवरेज कभी नहीं मिलेगी, जैसे किसी स्टार किड को मिलेगी। आज भी सुर्खियों में ‘कॉफी विद करण’ पर आलिया भट्ट की अज्ञानता रहेगी, जबकि यदि किसी फिल्म में अपने अद्भुत अभिनय से कोई पंकज त्रिपाठी या विक्रांत मैसी चार चाँद लगा दें, तो मीडिया वाले उसे घास भी नहीं डालेंगे।

आज जो मीडिया सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु पर घड़ियाली आँसू बहा रही है, कल वही मीडिया नेपोटिज़्म का गुणगान करते फिर रही थी। उदाहरण के लिए तैमूर अली खान के कवरेज को ही देख लीजिए। मीडिया उसके हर एक पल को कवर करने के लिए ऐसे लालायित रहती है जैसे वो कोई बच्चा नहीं, कोहिनूर का हीरा हो, जिसे अभी अभी भारत लाया गया हो। इस परिप्रेक्ष्य में टाइम्स नाउ का एक उदाहरण अच्छी तरह से याद आता है, जब तैमूर को लेकर न्यूज़ एंकर नाविका कुमार कुछ ज़्यादा ही इमोशनल हो गईं, और फिर सैफ अली खान ने अपने ही अंदाज़ में उन्हें ट्रोल किया। यदि मीडिया की प्राथमिकता एक स्टार किड के पल-पल की खबर ही जानना है, तो फिर भारतीय मीडिया भगवान भरोसे ही हैं।

सच कहें तो अभिषेक कपूर के खुलासे ने एक बार फिर सिद्ध किया है कि बॉलीवुड में वंशवाद को बढ़ावा देने के लिए केवल करण जौहर और सलमान खान जैसे लोग दोषी नहीं है। इसके लिए काफी हद तक भारतीय जनता और भारतीय मीडिया भी दोषी है। समय आ गया मीडिया को अपना आत्मवलोकन करके इस अनावश्यक प्रवृत्ति से निजात पाने की, अन्यथा वह ऐसे ही हंसी का पात्र बनी रहेगी।