“अब हमें चीन के खिलाफ खड़ा होना ही होगा” सोवियत यूनियन के बाद अब कम्युनिस्ट चीन आया NATO के निशाने पर

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कोरोना वायरस के कारण आज पूरे विश्व का जीवन अस्त-व्यस्त हो चुका है। इस चीन से फैले इस महामारी ने पूरे विश्व को एक प्रश्न पर आत्ममंथन करने के लिए विवश कर दिया है और वो प्रश्न है क्या चीन का सुपर पावर बनना विश्व के हित में है या अहित में! कुछ समय तक विश्व के अधिकतर देशों को चीन के आर्थिक और रणनीतिक महाशक्ति बनने से होने वाली समस्याओं का पता नहीं था लेकिन कोरोना ने यह एहसास दिलाया है कि पूरे विश्व को चीन पर से निर्भरता को कम कर उसे सप्लाइ चेन से बाहर करना होगा नहीं तो वह किसी भी देश में आर्थिक भूचाल ला सकता है।

अब विश्व कि सबसे ताकतवर संगठन NATO यानि North Atlantic North Atlantic Treaty Organization (NATO) भी अब अपना ध्यान चीन की ओर फोकस कर रहा है। नाटो के महासचिव जनरल Jens Stoltenberg ने कहाचीन का उदय बुनियादी रूप से शक्ति के वैश्विक संतुलन को बदल रहा है … और इससे समाज और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए खतरा बढ़ा है। उन्होंने एक समान विचारधारा रखने वाले देशों जो चीन की गुंडागर्दी के खिलाफ हैं, उन्हें सैन्य गठबंधन में शामिल होने का आग्रह किया। यह पहली बार है जब NATO प्रत्यक्ष रूप से अपना ध्यान सोवियत यूनियन या रूस से हटा कर एक और कम्युनिस्ट देश की तरफ कर रहा है।

बता दें कि इस ट्रांस-अटलांटिक संगठन को वर्ष 1949 में स्थापित किया गया था जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व अमेरिका और सोवियत यूनियन के बीच होने वाले शीत युद्ध की ओर बढ़ रहा था।

अगले चार दशकों तक इस संगठन ने सदस्य राज्यों को कम्युनिस्ट सोवियत यूनियन से बचाए रखा तथा शांति प्रदान की। शीत युद्ध के उस दौर में पूरा विश्व दो ध्रुव में बंट चुका था। पहले का नेतृत्व अमेरिका कर रहा था तो दूसरे का सोवियत यूनियन।

लेकिन 1989 के दौर में सोवियत संघ के विघटन के साथ शीत युद्ध समाप्त हो गया और फिर परिवर्तन आना शुरू हुआ। इसके बाद NATO की आवश्यकता नहीं रह गयी और कई बार इसके अस्तित्व पर सवाल किया गया।

फिर 2001 में अमेरिका पर अलकायदा के हमले ने NATO को एक नया मिशन दिया। इसके बाद इसके संविधान में बदलाव कर इसे समूहिक सुरक्षा से जोड़ा गया। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर किसी दुश्मन ने ‘एक या अधिक सदस्यों पर आक्रमण किया तो सभी सदस्य देशों पर आक्रमण माना जायेगा।

मगर अब सोवियत यूनियन और अलकायदा से भी बड़ी समस्या खड़ी हो चुकी है और वह है चीन। आज चीन रूस या किसी भी अन्य देश से अधिक ताकतवर है और उसका इस तरह से ताकतवर बनना अन्य के लिए खतरा है। अमेरिका ने भी चीन के रूप में बढ़ते खतरे को भाँप लिया था खास कर डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता संभालते ही। आज अमेरिका रूस से अधिक नजर चीन की गतिविधियों पर रखे हुए है।

पहले अमेरिका और यूरोप चीन को खतरे के रूप में नहीं देखते थे लेकिन कोरोना के बाद से सब कुछ बदल चुका है। आज यूरोप के कई देश और अमेरिका के लिए चीन के प्रति एक समान सोच है। इसी का परिणाम है कि अब NATO ने अपना फोकस एक और कम्युनिस्ट देश चीन की तरफ किया है।

नाटो महासचिव Jens Stoltenberg जो कि नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं, उन्होंने यह स्वीकार किया है कि चीन अब एक वास्तविक “खतरा” है और यह अमेरिका ही नहीं बल्कि अन्य देशों में भी इस कम्युनिस्ट देश को खतरे के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि, Jens Stoltenberg ने यह भी कहा कि, “NATO चीन को नए दुश्मन या एक विरोधी के रूप में नहीं देखता है।” फिर उन्होंने आगे यह भी कहा कि, लेकिन … उनका रक्षा बजट पहले से दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा रक्षा बजट है। वे आधुनिक सैन्य क्षमताओं में भारी निवेश कर रहे हैंजिसमें मिसाइल भी शामिल हैं जो सभी नाटोसहयोगी देशों तक पहुँच सकते हैं।

यानि उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से आखिरकार कह ही दिया कि चीन NATO के लिए एक खतरा है।

NATO के महासचिव ने बताया कि कैसे चीनी सेना का बढ़ता प्रभाव ट्रांस-अटलांटिक सैन्य गठबंधन के लिए का “सुरक्षा चिंता” का विषय है। उन्होंने कहा, हम चीनी सेना को आर्कटिक में देखते हैंअफ्रीका में देखते हैं। वे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे में निवेश कर रहे हैं। और वे रूस के साथ अधिक से अधिक काम कर रहे हैं। यह सब नाटो सहयोगियों के लिए सुरक्षा के तहत चिंता का विषय है।

Stoltenberg ने कहा कि नाटो को वैश्विक संस्थानों की रक्षा करने और outer space, cyber space, नई प्रौद्योगिकियों तथा वैश्विक हथियारों के नियंत्रण के लिए ऑस्ट्रेलिया, जापान, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ काम करने की आवश्यकता है।

यानि अब NATO और अमेरिका चीन के खिलाफ अपना ध्यान केन्द्रित कर चुके हैं। ट्रम्प और नाटो नेतृत्व फिर से शीत-युद्ध के दौर में लौट रहा है बस इस बार दुश्मन अलग है।