कैसे शरद पवार उद्धव के साथ वहीं कर रहे हैं जो उद्धव ने BJP के साथ किया

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महाराष्ट्र में वर्तमान स्थिति जो भी हो, पर इतने महीनों में सबको पता चल चुका है कि यहां सिक्का किसका चलता है। सीएम भले ही शिवसेना के उद्धव ठाकरे हों, पर असल सत्ता  तो शरद पवार के एनसीपी के पास ही है, और वे उसे जताने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने देते, जैसे हाल ही में सोनू सूद के मामले में  उन्होंने सिद्ध किया।

अपने दम पर कई प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजने में सहायता करने वाले अभिनेता सोनू सूद पर हाल ही में शिवसेना के नेता संजय राउत ने पार्टी मुखपत्र सामना के जरिए निशाना साधा था। लिहाजा, संजय राउत के इस ओछे बयान पर सोशल मीडिया पर भयंकर आक्रोश उमड़ पड़ा और सभी ने संजय राउत को उनके ओछे बयान के लिए आड़े हाथों लिया।

पर शिवसेना के लिए भद्द पिटवाने वाली बात तो तब हो गई जब एनसीपी स्वयं सोनू सूद के समर्थन में सामने आई। एनसीपी से राज्य के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा, “एक्‍टर सोनू सूद ने बहुत से प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजकर अच्‍छा काम किया है। मैंने नहीं सुना कि संजय राउत साहब ने इस पर क्‍या कहा है। जो लोग अच्‍छी पहल करते हैं हम उनकी सराहना करते हैं भले ही वह सोनू सूद हो या कोई और

दरअसल, एनसीपी महा विकास आघाड़ी में वहीं काम कर रही है, जो कभी शिवसेना भाजपा के साथ गठबंधन में रहते हुए भी करती थी। चाहे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार का विरोध कर उसे अपमानित करना हो, या फिर राम मंदिर के निर्माण प्रक्रिया में देरी होने पर भाजपा पर तंज कसना हो, शिवसेना ने गठबंधन में रहकर भी हमेशा विपक्ष की ही भूमिका निभाई है। अब लगता है कि एनसीपी शिवसेना को उसी की शैली में राजनीति का पाठ पढ़ा रही है।

पर ठहरिए। यह कोई पहला उदाहरण नहीं है जब एनसीपी ने महा विकास अघाड़ी में अपनी धाक जमाई हो और शिवसेना के मत या उसके निर्णय को ही दरकिनार कर दिया हो। मार्च के अंत में जब वुहान वायरस ने महाराष्ट्र में पैर पसारना शुरू कर दिया था, तब स्थिति और संक्रमण के खतरे को देखते हुए शिवसेना द्वारा शासित बीएमसी यानी बृहन्नमुंबई नगर पालिका ने दिशा निर्देश  जारी किए कि संप्रदाय कोई भी ही, वुहान वायरस से मारे जाने वाले सभी लोगों का दाह संस्कार होगा। परन्तु एनसीपी के एक इशारे पर इस निर्णय को वापिस  ले लिया गया।

ये तो कुछ भी नहीं है। जब मुसलमानों को राज्य में आरक्षण देने की बात कही गई, तो शिवसेना ने बताया कि महा विकास आघाड़ी इसपर मिलकर निर्णय लेगी। परन्तु एनसीपी ने मानो शिवसेना को ठेंगा दिखाते हुए बताया कि वे जल्द ही एक विशेष अधिनियम  के साथ इस प्रावधान को लागू करेंगे।

इतना ही नहीं, जब शिवसेना ने मजदूर संकट के लिए रेलवे मंत्रालय पर निशाना साधने का प्रयास किया, तो एनसीपी मोदी सरकार के समर्थन में खुलकर सामने आई। वरिष्ठ एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल के अनुसार, उनके कार्यों की सराहना करनी चाहिए। हम इस बात की प्रशंसा करते हैं कि केंद्र सरकार ट्रेनों की व्यवस्था करा रही है ताकि लोग अपने घर पहुंच सके”।

इसके अलावा  महाराष्ट्र में NCP-शिवसेना और कांग्रेस की सरकार बनी थी, तो महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने मंगलवार को एनसीपी नेताओं के प्रतिनिधिमंडल को यह आश्वासन दिया कि 2 और 3 जनवरी, 2018 को भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के संबंध में दलित कार्यकर्ताओं के खिलाफ दायर आपराधिक मामले वापस ले लेंगे। लेकिन जब केंद्र सरकार ने मामले की जांच एनआईए को सौंपी, तो एनसीपी ने शिवसेना के भाजपा से पुराने संबंधों पर तंज कसने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

ऐसे में यह कहना कहीं से भी गलत नहीं होगा कि जो काम शिवसेना कभी भाजपा के साथ किया करती थी, आज वही काम एनसीपी शिवसेना के साथ कर रही है, यानी सरकार में रहकर सत्ताधारी पार्टी का ही विरोध करना। शिवसेना की हालत धोबी के कुत्ते जैसे हो गई है, क्योंकि वह ना घर की रही और ना ही घाट की। स्पष्ट है अब शिवसेना को अपनी ही दवा का स्वाद चखने को मिल रहा है।