बाबरी ढॉंचे के नीचे बिरियानी बनाता मिला मुगल, आज भी है चूल्हे में आग: शेख की दाढ़ी चूसने वाले लिबरलों ने देखा

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मुस्लिमों का महिमामंडन एक बार फिर चर्चा का विषय है। या यूँ कहें कि एक वर्ग की पहचान ही मुस्लिमों का महिमामंडन रह गया है। अयोध्या रामजन्मभूमि निर्माण कार्य के दोबारा शुरू होने के बाद निर्माण स्थल से प्राचीन अवशेष और मन्दिर की कलाकृतियाँ मिली हैं।

इनमें शिवलिंग हैं। मन्दिर के मेहराब हैं। ऐसी ही कई और चीजें समतलीकरण की प्रक्रिया में ऊपर आई हैं, जिन्होंने मुगलों की महानता के दोहे गाने वाले नव-उदारवादियों को एक बार फिर रोजगार दे दिया है।

मन्दिर निर्माण की जगह से मिल रहे साक्ष्यों के फौरन बाद मुस्लिम पक्ष के वकील ने बयान दिया कि ये साक्ष्य मन्दिर के नहीं हैं। बदले में लोग उनका शुक्रिया कहना भूल गए कि उन्होंने ये नहीं कहा कि जो शिवलिंग आज निकला है, उसकी स्थापना बाबर ने की थी और लगे हाथ ये भी साबित हो जाता कि बाबर सेकुलर आक्रांता था।

रसीले आम का शौक़ीन शेख

सभ्यताओं के ‘मुगलीकरण’ से एक कहानी याद आती है। एक बार अरब का एक शेख व्यापार के लिए भारत की ओर आया और रसीले आमों का गुलाम हो गया। वो वहाँ अपने पूरे दल-बल और लाव-लश्कर के साथ पहुँचा था।

मेजबान के घर उसकी खूब खातिरदारी की गई। जब उसने भारत का स्वादिष्ट भोजन निपटा लिया, उसके बाद अंत में उसे आम परोसे गए। आम का स्वाद इतना जबरदस्त था कि शेख ने मन बना लिया कि वह इन आमों को अपने कबायली साथियों को वापस लौट कर जरूर खिलाएगा।

इसी उम्मीद में उसने अपने साथ लाए सभी ऊँट और घोड़ों में जितना संभव हो सका उतने आम लाद लिए। फिर शेख ने अपने मेजबान से विदा माँगी और वापस अपने रेतीले देश निकल पड़ा।

लेकिन वापस लौटते वक्त वह कई दुर्गम रास्तों से गुजरा। रास्ता बहुत लंबा था और धूप तेज थी। जिस कारण उसके साथी थकने लगे और उसके ऊँट और घोड़े बदहाल होते गए। उसके साथियों ने शेख को सलाह दी कि उसे अगर अपने ऊँट और घोड़े सही सलामत चाहिए तो उसे आमों के बोझ को कम करना ही होगा।

यह बात शेख को पसंद तो नहीं आई। लेकिन मजबूरी में उसने फैसला किया कि कुछ ऊँटों से आम का बोझ कम किया जा सकता है। ऐसा करते-करते उसके कई ऊँट रास्ते में मर भी गए। अब उसके साथ उसके कुछ साथी ही बच गए थे। बाकी बचे कुछ ऊँट और घोड़े लगभग सब थक चुके थे और एक कदम आगे चलने में भी असमर्थ थे।

शेख के लिए अभी भी मुद्दा उसके रसीले आम थे। आखिर उसने फैसला किया अगर उसे अपने साथियों को आम का स्वाद बताना है तो उसे कम से कम एक आम तो अपने साथ रखना होगा। लेकिन कई दिनों के इस लम्बे सफर में अब आम भी बहुत ज्यादा चलने वाला नहीं था।

शेख के एक साथी ने उसे एक नेक सलाह दी कि वह उस आम को निचोड़ कर उसमें अब अपनी दाढ़ी भिगो ले। शेख ने ऐसा ही किया। आम के रस से उसकी दाढ़ी में भी नई जान आ गई और इतिहासकारों को भी मुगलों की दाढ़ी से उनकी पहचान करने में आसानी हुई। कुछ महीनों के सफर के बाद आखिर वह अपने घर पहुँचा।

उसने बिना साँस लिए फौरन अपने सभी साथियों को इकट्ठा किया। उसने सबको उस रसीले आम के स्वाद की महिमा के बारे में बताया और कहा कि अब वह सब एक-एक करके उस आम का स्वाद लेने के लिए उसकी दाढ़ी को चूसेंगे।

उसके सभी कबायली साथियों ने यही किया। आखिरकार शेख खुश था कि उसने अपने साथियों को अपने दोस्त के घर पर खाए हुए रसीले आमों का स्वाद बता पाया।

असली रहस्य यहाँ से शुरू होता है। दरअसल, शेख की दाढ़ी से आम का स्वाद लेने वालों में भारत के कुछ बुद्धिजीवी और वाम उदारवादी लोग भी शामिल थे। बल्कि व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर प्रकाशित एक लेख में बताया गया है कि ये जमात शेख की दाढ़ी से आम का स्वाद चूसने के बाद ही वाम-उदारवादी बने थे।

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी में ये किस्सा उसी अध्याय के साथ दिया गया है, जिसमें बसों को ऑटो-रिक्शा और स्कूटर में तब्दील करने की कला के बारे में बताया गया है।

शेख की दाढ़ी चूसने के बाद नव-उदारवादियों ने फौरन वहाँ से लौटकर भारत का इतिहास लिखा और उसमें बताया कि भारत के आम स्वादिष्ट तो थे, लेकिन शेख की दाढ़ी से टपकने वाले रस की बात ही कुछ और थी।

भारत के वामपंथी उदारवादियों का मुगल-प्रेम इस कहानी के प्रत्येक पात्र घटना से संयोग ही नहीं रखता, बल्कि ऐसा लगता है मानो वो इसका ही हिस्सा रहे थे।

कल सुबह भारत का प्रोग्रेसिव विचारक वर्ग अगर यह कहता है कि अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि के निर्माण स्थल को अगर थोड़ा सा और खोदा जाए तो वहाँ से बाबर के बिरयानी के पतीले भी निकल सकते हैं। अगर लिखने वाले नेहरूवादी नमक में डूबे पत्रकार हों, तो यह दावा भी कर सकते हैं कि जिस चूल्हे में बाबर बिरयानी पका रहा था, उसमें अभी भी आग बाकी है।

वामपंथी रिपोर्टर्स कल सुबह उठकर अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर उस निर्माण स्थल को पाताल लोक तक खोदने का भी प्रयास कर सकते हैं और इस पूरे घटनाक्रम का उद्देश्य सिर्फ यही साबित करना होगा कि शेख की दाढ़ी के निकले आम का रस आज भी वामपंथी इतिहासकारों, साहित्यकारों और पत्रकारों की रगों में दौड़ रहा है।