राम मंदिर भूमिपूजन के बाद पहली स्वतंत्रता दिवस के मायने, क्योंकि अयोध्या से आगे मथुरा-काशी भी है…

ट्रेडिंग

गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है;

राम चरित सत कोटि अपारा, श्रुति सारदा न बरनै पारा

वाल्मीकि रामायण से राधेश्याम रामायण तक। लोमश संहिता के रामायण से रामकीर्ति महाकाव्य तक। नेपाल के भानुभक्त कृत रामायण से तुर्की के खोतानी रामायण तक। पूरी दुनिया में 300 से अधिक रामायण हैं। भारत समेत दुनिया के 10 देशों की करीब दो दर्जन भाषाओं में रामायण के 3000 से अधिक संस्करण हैं।

इन सब रामकथाओं के मूल में मानवता, कर्तव्यनिष्ठा, धर्मपरायणता, तितिक्षा और करुणा का वही भाव है, जो सनातन धर्म अपने में समेटे हैं। यह, ‘उत्तरं यत समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं, वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र संततिः’ के कण-कण में विराजमान है।https://platform.twitter.com/embed/index.html?creatorScreenName=JhaAjitk&dnt=false&embedId=twitter-widget-0&frame=false&hideCard=false&hideThread=false&id=1291019545138741248&lang=en-gb&origin=https%3A%2F%2Fhindi.opindia.com%2Fopinion%2Fsocial-issues%2Fthe-year-after-ayodhya-ram-janmabhoomi-kashi-mathura%2F&siteScreenName=OpIndia_in&theme=light&widgetsVersion=223fc1c4%3A1596143124634&width=550px

जाहिर है, 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में जो कुछ हुआ वह महज एक पूजा स्थल का शिलान्यास ही नहीं था। इसी तरह 11 अगस्त 2020 की रात बेंगलुरु में जो कुछ हुआ वह ​केवल एक भीड़ की हिंसा नहीं थी। मंदिर के सामने बनी वह मानव श्रृंखला उतनी ही उदार और निश्चल नहीं थी, जितनी हमारी मीडिया ने हमें बताया।

सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। एक तरफ है करीब 1000 साल से चल रहा छल, प्रपंच और जोर। दूसरी तरफ है हिंदुओं का वह नैतिक बल, जिसका पहला पड़ाव सोमनाथ का पुनरुद्धार था। वह भारतीय चेतना, जिसकी अप्रतिम ऊर्जा अयोध्या है। वह सनातनी संस्कृति, जिसका प्रकाश पुंज मथुरा-काशी है।

पिलग्रिमेज टू फ्रीडम (Pilgrimage To Freedom) में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने कहा है, “मेरे लिए उस आजादी का कोई मूल्य नहीं है जो मुझे भगवद्गीता से वंचित कर दे या मेरे जैसे लाखों लोगों के मन में मंदिरों के प्रति आस्था को उखाड़ फेंके। मुझे सोमनाथ के पुनरुद्धार के सपने को जीने और उसे साकार करने का विशेषाधिकार दिया गया है।”

सोमनाथ पुनरुद्धार को लेकर नेहरू को मुंशी का जवाब

यदि सोमनाथ सनातन सभ्यता के पुनरुद्धार का प्रतीक था, तो अयोध्या का राम मंदिर सनातन चेतना की स्वतंत्रता का प्रतीक है। जैसा कि पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. डेविड फ्राउली कहते हैं, “5 अगस्त 2020 को राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण की नींव 1947 के बाद भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण तिथि है। यह भारतीय सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिकता की स्वतंत्रता का प्रतीक है।”

सोमनाथ में विध्वंस के अवशेष (1895) साभार: The British Library Board

एक लेख में विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने लिखा है, “अयोध्या में बनने जा रहा मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं होगा, बल्कि यह भारत में रामत्व यानी स्वाभिमान, समरसता, समृद्धि, सुख, शांति और सौहार्द की स्थापना करेगा। यह विशाल मंदिर भारत के विराट स्वरुप का दर्शन भी कराएगा।”

सोमनाथ, सनातन सभ्यता के पुनरुद्धार का प्रतीक

स्पष्ट है कि अयोध्या का राम मंदिर हिंदुओं के 500 साल के संघर्ष की केवल तार्किक परिणति भर भी नहीं है। यह उस खतरे से मुक्ति का मार्ग है, जिसका जिक्र नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से बरसों पहले किया था। अमेरिका के 9/11 के हमले के बाद ‘इस्लामिक आतंकवाद और मुसलमान’ विषय पर एक टीवी डिबेट के दौरान उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि पूरी दुनिया के लिए इस्लाम का एक रोडमैप है। इसके तीन हिस्से हैं;

  • दारुल अमन
  • दारुल हरम
  • दारुल इस्लाम
https://youtube.com/watch?v=JbIQ5oaM5Mg%3Ffeature%3Doembed%26enablejsapi%3D1

भारत में पिछले 1000 सालों से जो कुछ हो रहा वह दारुल हरम का हिस्सा है। वरना क्या कारण था कि भारत के शासन सूत्रों पर कब्जा होने के बावजूद इस्लामिक आक्रांताओं ने हमारे मंदिरों का विध्वंस किया? जहाँ पहले से हमारे देवी-देवता विराजमान थे, उन्हीं जगहों को मस्जिद के लिए चुना?

वे तब भी उसी मिशन पर थे, जो कल हमने बेंगलुरु में देखा, परसों कहीं और देखा था, कल कहीं और देखेंगे। इसका स्वरुप अलग हो सकता है पर संदेश हर बार एक ही होता है। वह संदेश है, बुतपरस्ती हराम है। इस्लाम न मानने वाला काफिर है। काफिरों की हत्या जायज है। पूरी दुनिया को दारुल इस्लाम बनाना है।

क्या ‘एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ की संस्कृति केवल दारुल इस्लाम से ही मुकाबिल है?

यकीनन, नहीं। मुकाबला एक चौकड़ी से है। इसमें दारुल इस्लाम की सोच के साथ-साथ वामपंथी इतिहासकारों का फरेब, तुष्टिकरण की राजनीति और ईसाई मिशनरी भी शामिल हैं।

जैसा कि डॉ. फ्राउली कहते हैं, “भारत की प्राचीन और विशाल संस्कृति को वामपंथ के नजरिए से समझना वैसा ही है, जैसे कुएँ के मेढ़क से समुद्र को समझना।” अयोध्या का 500 साल का संघर्ष इसका प्रमाण है। वहाँ राम जन्मभूमि का एक इस्लामी अक्रांता ने विध्वंस किया। लेकिन आजाद भारत में भी उसे जायज ठहराने वाले और राम के अस्तित्व को नकारने वाले वामपंथी इतिहासकार और नेहरू पोषित राजनीति ही थी।

महमूद गजनी ने जब भारत के मंदिरों को लूटा, उनका विध्वंस किया तो उसका जश्न बगदाद के खलीफा और वहाँ के मुसलमानों ने मनाई थी। उसकी तुलना अरब, सीरिया, ईरान, इराक वगैरह में इसी तरह की फतह हासिल करने वाले नबी के साथियों से हुई। लेकिन, भारत के वामपंथी इतिहासकारों ने मजहबी उन्माद के विमर्श को ही नेपथ्य में धकेल दिया। हमारी आस्था और हमारे पवित्र जगहों पर प्र​हार को ‘लूट’ का नाम दे दिया। कहा कि इन हमलों के पीछे कोई मजहबी मकसद नहीं था। उस समय भारत सोने की खान था, इसके कारण हमला हुआ। सोना मंदिरों में संरक्षित किया जाता था, इसलिए वे निशाना बने।

इंदिरा गाँधी को 1932 में लिखे एक पत्र में नेहरू ने भी इसी सिद्धांत की पैरवी की थी। उनके मुताबिक गजनी वास्तुकला का मुरीद था और उसने मथुरा के मंदिरों की वास्तुकला की बेहद प्रशंसा की थी। लेकिन, नेहरू ने यह नहीं बताया कि इसी गजनी ने सन् 1018 में मथुरा के सारे मंदिरों का ध्वंस कर दिया था। उसके जाने के बाद फिर से मंदिर बने और उनका भी बाद के इस्लामिक अक्रांताओं ने विध्वंस कर दिया। ऐसा ही काशी में हुआ। मथुरा में आज जहाँ शाही ईदगाह मस्जिद खड़ी है, वह श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है। इसी तरह काशी का ज्ञानवापी मस्जिद ध्वस्त किए गए मंदिर पर खड़ा है।

लेकिन नेहरू और वामपंथ पोषित राजनीति और इतिहास की दृष्टि ने स्वतंत्र भारत में भी इस्लाम के नाम पर हर ध्वंस, हर हिंसा को जायज बनाया। जिसने भी इस्लामिक आक्रांताओं के मूर्ति भंजन और हिंदुओं की प्रताड़ना को उजागर किया उसे ‘सांप्रदायिक’ का तमगा दिया गया। धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय अखंडता के लिए खतरा करार दिया गया। सो, ताज्जुब नहीं होना चाहिए कि आज भी सुनियोजित तरीके से जमा हुए, हिंसा के लिए निकले मुसलमानों की भीड़ को नेपथ्य में धकेल कर बताया जा रहा है कि वह देखो मंदिर बचाने के लिए मुसलमानों की मानव श्रृंखला।

ऐसे में अयोध्या का राम मंदिर, हिंदू होकर जीने के इस जटिलता से मुक्ति का रास्ता प्रशस्त करता है। जैसा कि पत्रकार ज्ञानेंद्र बरतरिया ने एक लेख में कहा है, “अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने का अर्थ है एक युग की समाप्ति और एक नए युग की शुरुआत। यह नया युग भारत के भाग्योदय का है। यह मंदिर ऐसी ऊर्जा पैदा करेगा, जिससे एक नए भारत का निर्माण होगा।”

उपासना स्‍थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 की बाध्यता रहते यह निर्माण अधूरा है।

क्या है प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट?

अयोध्या से रामलला को बेदखल करने के नेहरू के प्रयासों से आप परिचित हैं। जब राम मंदिर का आंदोलन अपने चरम पर था तो कॉन्ग्रेस ने 1991 के चुनावी घोषणा-पत्र में अपनी तुष्टिकरण की राजनीति के तहत एक कानून का वादा किया। इसका मकसद उन पवित्र भूमि पर हिंदुओं का दावा खत्म करना था, जिसका विध्वंस इस्लामिक अक्रांताओं ने किया था। यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि जब घोषणा-पत्र में यह वादा किया गया था, तब राजीव गाँधी कॉन्ग्रेस के सर्वेसर्वा थे। उनकी हत्या चुनाव प्रचार के दौरान हुई थी।

चुनावों के बाद जब 1991 में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी तो मॉनसून सत्र में एक बिल लाया गया। तब के गृह मंत्री शंकरराव चव्हाण ने लोकसभा में बहस के दौरान इस बिल को भारत के प्रेम, शांति और आपसी भाईचारे के महान संस्कारों का सूचक बताया था। 18 सितंबर 1991 को राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह बिल कानून बन गया। इसे ही हम आज प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट या उपासना स्‍थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 के नाम से जानते हैं।

अदालत में होने के कारण अयोध्या विवाद को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया था। यही कारण है कि बीते साल इस मामले में तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट फैसला दे पाई। लेकिन, मथुरा-काशी की राह में यह कानून बड़ी अड़चन है। इस कानून के अनुसार 15 अगस्त 1947 को देश में धार्मिक स्थलों की जो स्थिति थी, वही बनी रहेगी।

हम, ‘एकम सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ को मानने वाले लोग हैं। बहुसंख्यक होते हुए भी अपनी आस्था थोपने वाले लोग नहीं हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यकीन करने वाले लोग हैं। ऐसा नहीं होता तो बेंगलुरु की सड़कों पर हमें होना था, क्योंकि फेसबुक पोस्ट हमारी आस्था को चोट कर किया गया था। लेकिन, सुनियोजित तरीके से उतरे जिहाद में यकीन करने वाले वे लोग जिनके लिए कथित तौर पर इस पोस्ट के जवाब में एक कमेंट किया गया था। ऐसे में हमारे पास अपनी पवित्र भूमि को इस्लामिक अताताइयों की छाया से मु​क्त कराने का मार्ग कानूनी रास्ते से ही निकलेगा। इसके लिए जरूरी है, प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की वैधता का खत्म होना।

कैसे खत्म होगा कानून?

सुप्रीम कोर्ट के वकील शशांक शेखर झा ने ऑपइंडिया को बताया, “झूठे सेकुलरिज्म के नाम पर आए इस कानून का काम है कि देश इस्लामिक आक्रांताओं को भूल जाए। सभी दंश भूल जाए। कभी भी उन मंदिरों पर अपना दावा ना करे जो एक समय मे हिंदुओं के पूजनीय स्थल थे और इस्लामिक आक्रमणकारियों ने बल व छल से जिन पर कब्जा कर लिया।”

उन्होंने कहा, “कायदे से होना तो यह चाहिए था कि देश स्वतंत्र होने के बाद ऐसे सभी जगहों को हिंदुओं को सौंप देना चाहिए था। लेकिन वोट बैंक के लालच में इस कंलकित कानून को संसद से पास कर दिया गया।” झा ने बताया कि अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि 1991 का उपासना स्थल अधिनियम साफ करता है कि 15 अगस्त 1947 के दिन तक जिस भी पूजा स्थल की जो भी स्थिति है, उसमें कोई धार्मिक बदलाव की इजाजत नहीं है। इसलिए इन मामलों से जुड़े सभी मुकदमे अब खत्म माने जाएँगे।

उन्होंने कहा, “स्पष्ट है कि इस कानून के रहते मथुरा-काशी की यथास्थिति नहीं बदली जा सकती, जबकि इस कानून की नींव ही गलत है। संघीय ढाँचे के अनुसार भी यह कानून अनैतिक है। कानूनन तीर्थ स्थल, शमशान घाट व अन्य राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। उनके कानून राज्य ही बना सकता है।” उन्होंने बताया कि यदि मोदी सरकार चाहे तो इस अनैतिक कानून को खत्म कर सकती है। इसके लिए उसके पास लोकसभा में बहुमत है। राज्यसभा में बीजेडी, एआईडीएमके जैसे क्षेत्रीय दलों के सहयोग से वह ऐसा कर सकती।

कानूनी जानकारों अनुसार सरकार चाहे तो अध्यादेश के जरिए भी अल्पकालिक तौर पर इस कानून की बाध्यता खत्म कर सकती है। लेकिन इसमें उसे मुश्किल हो सकती है क्योंकि उसे यह भी बताना होगा कि अध्यादेश लाना जरूरी था और विलंब नहीं किया जा सकता था। ऐसे में संसद के जरिए पूर्ण रूप से इस कानून को हटाना सबसे बेहतर विकल्प है।

मथुरा-काशी यानी बचे-खुचे वामपंथ का पिंडदान

मथुरा-काशी भी अयोध्या की तरह महज एक मंदिर नहीं हैं। यही कारण है कि तीनों भूमि की मुक्ति का खाका भी एक साथ ही खींचा गया था। जिस दिन मथुरा-काशी मुक्त होगी, उस दिन बचे खुचे वामपंथ का भी पिंडदान हो जाएगा। वैसे भी राम, कृष्ण और महादेव का नाम मनुष्य की चेतना को मुक्त करता है। उसे बाँध कर कुंठित नहीं करता। इसी से फैज जैसों की मुक्ति का मार्ग भी निकलेगा, जो कहते हैं कि राम हमारे पूर्वज थे।

इसके लिए जरूरी है कि हम आप भी सिकुलर और लिबरल बहस के झाँसे में न आएँ। जो विचार सनातन आस्था और संस्कृति में यकीन नहीं करता, वह भारत के भौगोलिक अस्तित्व के लिए भी उतना ही खतरनाक है, जितना हमारे अस्तित्व के लिए।

यदि हम ऐसा नहीं कर पाए तो वे हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी संस्कार, साहित्य और मानवता बाबर के मार्फत सिखलाते रह जाएँगे।

याद रखिएगा, गोस्वामी तुलसीदास विनय पत्रिका में लिखकर गए हैं;

जाके प्रिय न राम बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि प्रेम सनेही।।

अब तजने की बारी आपकी है।