हम HAL के Choppers नहीं लेंगे”, Navy ने HAL को दिखाई उसकी औकात, अब HAL का खात्मा ज़रूरी है

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भारत के डिफेंस सेक्टर की PSU हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड यानि HAL को नौसेना ने एक बड़ा झटका देते हुए उनके Advanced Light Helicopter डिजाइन को अस्वीकार कर दिया है।

नौसेना ने स्पष्ट कहा है कि HAL द्वारा बनाई गये हेलीकाप्टर उनकी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते हैं। इस PSU के स्थापना के बाद से ही इसकी क्षमताओं पर सवाल उठते आए हैं। नौसेना के इस हालिया बयान से इस बात को और भी बल मिला है।

दरअसल, इकोनॉमिक्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार नौसेना Advanced Light Helicopter की आगामी 21,000 करोड़ रुपये के मेक इन इंडिया अनुबंध हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को देने के पक्ष में नहीं है। नौसेना का कहना है कि HAL द्वारा प्रस्तावित हेलिकॉप्टर नौसेना की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते हैं। यही नहीं, HAL की अक्षमताओं को देखते हुए नौसेना ने कहा है कि आधुनिक हवाई जहाज के निर्माण के लिए निजी क्षेत्र में वैकल्पिक क्षमता स्थापित करने की सख्त आवश्यकता है।

इकोनॉमिक्स टाइम्स ने सूत्रों के हवाले बताया कि Advanced Light Helicopter (ALH) का नौसैनिक संस्करण जो नौसेना को दिया जा रहा है, वह बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है और आवश्यक कार्यों जैसे समुद्र में तत्काल खोज और बचाव मिशन के लिए अनुपयुक्त है।

यह पहली बार नहीं है जब HAL सेना के किसी भी अंग की आवश्यकताओं को पूरा करने में असफल रहा है। भारत की कई पब्लिक सेक्टर कंपनियों की तरह ये भी एक सफ़ेद हाथी सिद्ध हुआ है। HAL सिर्फ सुस्त ही नहीं है, बल्कि कई बार तो मूल लागत से कहीं ऊंचे दामों पर उपकरण या विमानों का निर्माण करता है। पिछले वर्ष रक्षा मंत्रालय द्वारा कराये गए एक ऑडिट के अनुसार HAL ने सुखोई जेट का निर्माण रूस की मूल कंपनी से 150 करोड़ रूपए से ज़्यादा में किया था। रिव्यू के अनुसार, “रूस में निर्मित एक सुखोई 30 MKI 269.77 करोड़ रुपये में बनकर तैयार होतीजबकि भारत के HAL में निर्मित यही एयरक्राफ्ट 417.69 करोड़ रुपये में बनकर तैयार होती हैजो मूल लागत से लगभग 150 करोड़ रुपये ज़्यादा है”।

HAL द्वारा मूल लागत से ज़्यादा ऊंचे दाम पर एयरक्राफ्ट बनाकर देश के राजकोष को नुकसान पहुंचाना कोई नई बात नहीं है। 2004 में भारत ने पायलटों के प्रशिक्षण के लिए ब्रिटेन में निर्मित हॉक जेट खरीदे थे, जिनकी मूल लागत 78 करोड़ रूपए थी।

कई मामलों में एयरक्राफ्ट समय पर पहुंचाने में HAL काफी देर भी करती है, यह डिफेंस पीएसयू के लिए एक गंभीर समस्या है। इसी वर्ष कुछ समय पहले पूर्व वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ ने भी HAL की सुस्ती पर सवाल उठाए थे । किसी भी अनुबंध को HAL द्वारा देर से डिलीवर करने पर पूर्व वायुसेना प्रमुख धनोआ ने कहा था कि, “आईएएफ़ ने कभी भी गोलपोस्ट नहीं शिफ्ट किया हैजैसा उस पर आरोप लगाया है। उपकरण पहुँचने में इतना समय लगता है कि हमारी तकनीक और अस्त्र-शस्त्र सब पुराने हो जाते हैं इस इवेंट के दौरान धनोआ ने पूछा- ‘हमने HAL को छूट दी लेकिन क्या युद्ध के समय दुश्मन का सामना करेंगे तो वह हमें छूट देगा?’ उन्होंने आगे यह भी कहा, “कॉम्बैट में कोई रजत पदक नहीं होता, या तो आप जीतते हैं या फिर पराजित होते हैं।”

धनोआ ने यह भी कहा कि एचएएल ने Mirage-2000 जेट के एक स्क्वाड्रन, SU-30 MKI के दो स्क्वाड्रन और एक स्क्वाड्रन जगुआर के उन्नयन में देरी की है।

वायुसेना के पूर्व प्रमुख की बातों से ये साफ पता चलता है कि एचएएल की अकर्मण्यता ने देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को कितना नुकसान पहुंचाया है। पिछले कुछ वर्षों में एचएएल की निष्क्रियता खुलकर सामने आई है। भारत में जेट विमानों के विकास पर नजर डालें तो तेजस अभी तक का सबसे देर से पूरा होने वाला प्रोजेक्ट है। यही नहीं, उन प्रमुख उदाहरण में से एक है। भारत में इस प्रोजेक्ट को पहली बार 1993 में HAL को सौंपा गया था। तब से लेकर इस कंपनी ने पहला विमान देने में लगभग 4 दशक लगा दिया। राजीव गांधी सरकार द्वारा इस प्रोजेक्ट को शुरू किए जाने के लगभग 37 साल बाद, फरवरी 2020 में IAF को 16 लड़ाकू जेट विमानों को सौंपा गया था। HAL जिस तरह से काम करता है, उससे यह पता चलता है कि भारत की पब्लिक सेक्टर की कंपनियाँ कितनी नाकाम रही हैं। यही नहीं, यहाँ अक्सर कर्मचारियों की हड़ताल देखने को मिलती  है। अगर विश्व की अन्य कंपनियों से इसकी तुलना करें तो HAL में निष्पादन सबसे धीमा है।

देश तो नेहरूवाद की जकड़ से मुक्त हो चुका है और ऐसे में डिफेंस PSU की ऐसी लापरवाही और अक्षमता को हल्के में नहीं लिया जा सकता। देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद, रक्षा और नागरिक उड्डयन सहित कई सामरिक क्षेत्र का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया, और निजी कंपनियों के प्रवेश को रोक दिया गया। इस तरह से लगभग सभी क्षेत्रों से निजी कंपनियों को रोके जाने से सरकारी कंपनियों के लिए किसी तरह की कोई प्रतिस्पर्धा ही नहीं रही। यही कारण है कि HAL जैसे PSUs बस नौकरी और हड़ताल का एक केंद्र बन कर रह गए हैं। इसी का परिणाम है कि आज, शीर्ष 30 रक्षा उत्पादकों में से एक भी कंपनी भारत की नहीं है और देश को लगभग सभी महत्वपूर्ण रक्षा उपकरणों का आयात करना पड़ता है। HAL की यह लापरवाही सीधे तौर पर नेहरूवादी समाजवाद का प्रतीक है, जिससे जितना जल्दी छुटकारा पा सकें, उतना ही देश के लिए हितकारी होगा।